हिंदू धर्मग्रंथों और सनातन परंपराओं में माता संतोषी के व्रत का एक अत्यंत विशिष्ट और महिमामयी स्थान माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, आदिशक्ति का यह सौम्य रूप भगवान श्री गणेश की पुत्री और रिद्धि-सिद्धि के गर्भ से उत्पन्न परम मंगलकारी देवी का है, जिन्हें संपूर्ण चराचर जगत में संतोष, मानसिक शांति और धैर्य की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाता है। ऐसा माना जाता है कि वर्तमान युग में जो भी श्रद्धालु पूर्ण श्रद्धा, अटूट विश्वास और शास्त्रों में वर्णित कड़े नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए शुक्रवार के दिन इस महाव्रत का अनुष्ठान करता है, माता संतोषी उसके जीवन से सभी प्रकार की दरिद्रता, गृह-क्लेश, मानसिक अशांति, आर्थिक तंगी और विघ्न-बाधाओं का जड़ से समूल नाश कर देती हैं। इस व्रत के प्रभाव से भक्तों के घर में अखंड लक्ष्मी, अटूट सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और असीम शांति का स्थाई वास सुनिश्चित होता है।
संतोषी माता व्रत के अनिवार्य एवं कठोर नियम
शास्त्रों के अनुसार, संतोषी माता का यह व्रत अपनी अत्यंत कठोर नियमावली के लिए जाना जाता है, जिसमें की गई छोटी सी भी भूल या अनजानी लापरवाही आपके संपूर्ण व्रत को पूरी तरह से खंडित कर सकती है। इसलिए व्रत रखने वाले प्रत्येक साधक को इस दिन अपनी शारीरिक और मानसिक पवित्रता के साथ-साथ खान-पान के इन विशेष शास्त्रीय नियमों का कठोरता से पालन करना अनिवार्य होता है। इसमें मानसिक शुद्धि का भी उतना ही महत्व है जितना शारीरिक शुद्धि का होता है।
सबसे महत्वपूर्ण नियम: खट्टी चीज़ों का पूर्ण रूप से निषेध
इस व्रत का सबसे मुख्य और अनिवार्य नियम यह है कि व्रत रखने वाले स्त्री या पुरुष को शुक्रवार के दिन भूलकर भी किसी भी प्रकार की खट्टी वस्तु का स्पर्श या सेवन नहीं करना चाहिए। इसमें नींबू, इमली, आम का अचार, दही, सिरका, छाछ, टमाटर, अमचूर, अनार, संतरा, मौसमी और किसी भी प्रकार के खट्टे फल या औषधियां पूरी तरह से वर्जित मानी गई हैं। केवल व्रत रखने वाला व्यक्ति ही नहीं, अपितु उसके पूरे परिवार में उस दिन घर के भीतर न तो कोई खट्टी चीज़ पकाई जाएगी और न ही परिवार का कोई अन्य सदस्य घर की सीमा के अंदर किसी भी खट्टी वस्तु का सेवन करेगा, अन्यथा माता का भयंकर कोप झेलना पड़ सकता है।
- व्रत की कुल संख्या का संकल्प: इस कल्याणकारी व्रत को लगातार 16 शुक्रवार तक पूरी निष्ठा के साथ रखने का शास्त्रीय विधान है। साधक अपनी विशेष मनोकामना या मन्नत के अनुसार इसे 7, 11, 21 या इससे भी अधिक शुक्रवार तक रखने का संकल्प अपनी सामर्थ्य के अनुसार ले सकता है।
- मानसिक शुद्धता और ब्रह्मचर्य: व्रत की पूरी अवधि के दौरान साधक को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इस दिन मन में किसी भी व्यक्ति के प्रति क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, अहंकार या कटु वचन जैसी तामसिक भावनाओं को बिल्कुल नहीं लाना चाहिए और पूरे दिन केवल भगवत चिंतन में मन लगाना चाहिए।
पूजन हेतु आवश्यक सामग्री
शुक्रवार की पावन सुबह पूजा प्रारंभ करने से पहले ही सभी आवश्यक और शुद्ध पूजन सामग्रियों को एक स्थान पर एकत्रित कर लेना चाहिए, ताकि पूजा के मध्य में किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न हो। शास्त्रों के अनुसार पूजन की थाली पूरी तरह व्यवस्थित होनी चाहिए जिसमें माता की प्रिय वस्तुएं शामिल हों।
- माता संतोषी की एक अत्यंत सुंदर, प्रसन्न मुद्रा वाली तस्वीर, चित्र या धातु की दिव्य प्रतिमा।
- एक शुद्ध तांबे, पीतल या मिट्टी का कलश, जो कंठ तक स्वच्छ जल से भरा हुआ होना चाहिए।
- मुख्य महाप्रसाद: सवा सेर (या अपनी सामर्थ्य के अनुसार) एकदम शुद्ध और साफ़ सुथरा गुड़ तथा भुने हुए चने।
- कलश के ऊपर रखने के लिए सवा रुपए का प्राचीन या आधुनिक सिक्का, जिसे माता के चरणों में अर्पित किया जा सके।
- अक्षत (अखंडित यानी बिना टूटे हुए चावल), रोली, शुद्ध कुमकुम, पीली हल्दी, चंदन और ताज़े लाल सुगंधित फूल या माला।
- गौ घृत (गाय के शुद्ध घी) से निर्मित दीपक, सुगंधित धूपबत्ती, कपूर और आरती संपन्न करने के लिए एक पीतल की थाली।
संतोषी माता व्रत की प्रामाणिक पूजा विधि
संतोषी माता की पूजा को ब्रह्ममुहूर्त में करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। शास्त्रों में वर्णित पूजा की क्रमानुसार संपूर्ण और सटीक विधि इस प्रकार है, जिसका श्रद्धापूर्वक निर्वाह करने से माता की कृपा अति शीघ्र प्राप्त होती है और घर के सारे क्लेश दूर हो जाते हैं:
- प्रातःकाल का स्नान और संकल्प: शुक्रवार के पावन दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर अपने दैनिक कृत्यों से निवृत्त हो जाएं। इसके पश्चात गंगाजल युक्त पानी से स्नान करके लाल, पीले या केसरिया रंग के अत्यंत स्वच्छ और पवित्र वस्त्र धारण करें। तत्पश्चात पूजा घर में बैठकर व्रत का मन में संकल्प लें।
- वेदी और चौकी की स्थापना: अपने घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) या पूर्व दिशा में एक पवित्र चौकी की स्थापना करें। उस चौकी को गंगाजल छिड़क कर शुद्ध करें और उस पर एक सुंदर लाल रंग का रेशमी वस्त्र बिछाएं। तत्पक्षात आदरपूर्वक माता संतोषी की प्रतिमा या चित्र को वहां सुशोभित करें।
- कलश और प्रसाद की स्थापना: स्थापित माता की प्रतिमा के ठीक सम्मुख जल से भरा हुआ कलश स्थापित करें। कलश के मुख पर एक छोटी पात्र (कटोरी) रखें और उस कटोरी के भीतर शुद्ध गुड़ और भुने हुए चने का महाप्रसाद भर कर रख दें। कलश के जल में थोड़ा सा गंगाजल और अक्षत अवश्य डालें।
- पंचोपचार पूजन और दीप-प्रज्वलन: अब माता के सामने गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और धूपबत्ती सुलगाएं। माता को रोली, कुमकुम और हल्दी से तिलक करें। इसके बाद उन्हें अक्षत, ताजे लाल फूल और पुष्पमाला अर्पित करें। कलश देव को भी तिलक लगाकर उनका ध्यान करें।
- एकाग्र मन से कथा श्रवण: इसके बाद अपने दोनों हाथों में थोड़ा सा गुड़ और बुन हुआ चना लेकर अत्यंत शांत चित्त और एकाग्र मन से संतोषी माता की पावन व्रत कथा का पाठ करें या श्रवण करें। ध्यान रहे कि कथा के मध्य में उठना, बोलना या ध्यान भटकाना शास्त्रों में वर्जित बताया गया है।
- आरती और पुष्पांजलि: जैसे ही कथा समाप्त हो, अपने हाथ का गुड़ और चना कलश के समीप रखे पात्र में डाल दें। इसके बाद कपूर जलाकर पूरे परिवार के साथ प्रेमपूर्वक संतोषी माता की मधुर आरती गाएं, शंख ध्वनि करें और अंत में माता के चरणों में पुष्पांजलि अर्पित कर साष्टांग प्रणाम करें।
- जल छिड़काव और प्रसाद वितरण: संपूर्ण पूजा समाप्त होने के बाद कलश के पवित्र जल को आम के पत्तों की सहायता से अपने पूरे घर के प्रत्येक कोने में छिड़कें ताकि घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाए। बचे हुए जल को तुलसी के पौधे में विसर्जित कर दें। कटोरी में रखे गुड़-चने के प्रसाद को स्वयं ग्रहण करें और परिवार के अन्य सदस्यों में वितरित करें।
संतोषी माता व्रत की परम पावन एवं प्रामाणिक कथा
एक वृद्ध महिला थी जिसका एक ही पुत्र था। वह वृद्धा अपने पुत्र से दिन-रात अत्यंत कठिन परिश्रम करवाती थी, परंतु ईर्ष्या और अज्ञानता वश उसे भोजन के नाम पर केवल बचा हुआ बासी रूखा-सूखा अन्न ही देती थी। लड़का स्वभाव से अत्यंत सीधा, सरल और अपनी माता की आज्ञा का पालन करने वाला था, इसलिए वह बिना किसी शिकायत के सब कुछ चुपचाप सह लेता था। एक दिन जब लड़के को अपनी माता के इस दुर्व्यवहार का प्रत्यक्ष भान हुआ, तो उसके कोमल मन को गहरा आघात लगा। उसने अपनी नियति को बदलने और धनोपार्जन करने के उद्देश्य से परदेस जाने का दृढ़ निश्चय कर लिया। घर से निकलते समय उसने अपनी पत्नी से कहा कि वह धैर्य रखे और अपना धर्म निभाए। चलते-चलते वह लड़का बहुत दूर एक बड़े महानगर में पहुँचा, जहाँ उसने एक अत्यंत प्रतिष्ठित और समृद्ध व्यापारी की विशाल दुकान पर नौकरी कर ली। अपनी दिन-रात की घोर मेहनत, ईमानदारी और कुशाग्र बुद्धि के बल पर उसने कुछ ही समय में व्यापार को कई गुना बढ़ा दिया, जिससे प्रसन्न होकर उस मुख्य व्यापारी ने उसे अपनी दुकान का बराबर का साझेदार बना लिया और वह लड़का अत्यंत धनवान बन गया।
परंतु दूसरी ओर, उसके परदेस जाते ही पीछे से उसकी वृद्ध सास और जेठानी ने उसकी सीधी-सादी पत्नी को असीम कष्ट देना प्रारंभ कर दिया। उसे पूरे दिन जंगल से भारी लकड़ियाँ चुनकर लाने का कठिन कार्य सौंप दिया गया और भोजन के लिए एक फटे-पुराने बर्तन में जौ के आटे की सूखी रोटी और भूसे का पानी दिया जाता था। वह पतिव्रता स्त्री इस असहनीय दुख में भी अपने धर्म पर अडिग रही। एक दिन जब वह वन से भारी लकड़ियों का गट्ठर सिर पर उठाकर अत्यंत व्याकुल मन से लौट रही थी, तो उसने मार्ग में एक भव्य मंदिर के पास कुछ भाग्यशाली महिलाओं को अत्यंत श्रद्धापूर्वक संतोषी माता का व्रत और पूजन करते हुए देखा। कौतूहल और श्रद्धा वश वह उनके समीप गई और उसने रोते हुए उन महिलाओं से इस व्रत की संपूर्ण शास्त्रीय विधि, इसके कठोर नियम और इसके चमत्कारी परिणामों के विषय में पूछा। वहां उपस्थित परम वैष्णव महिलाओं ने अत्यंत स्नेहपूर्वक उसे बताया कि यह भगवान गणेश की पुत्री संतोषी माता का महाव्रत है। इसे लगातार 16 शुक्रवार तक पूरी निष्ठा से रखना होता है। पूजा में केवल गुड़ और भुने हुए चने का भोग लगाना होता है, तथा इस पूरे दिन व्रत करने वाले को भूलकर भी किसी खट्टी वस्तु को न तो छूना होता है और न ही खाना होता है।
उस पीड़ित स्त्री के मन में माता के प्रति अटूट विश्वास जागृत हुआ और उसने अगले ही शुक्रवार से पूरे विधि-विधान से माता का व्रत रखना प्रारंभ कर दिया। जगत जननी माता संतोषी की दिव्य अनुकंपा से कुछ ही शुक्रवार बीते थे कि परदेस से उसके पति का अत्यंत प्रेमपूर्वक लिखा हुआ पत्र आया और साथ ही भारी मात्रा में धन भी प्राप्त हुआ। कुछ और समय बीतने के पश्चात, उसका पति अपार स्वर्ण-मुद्राओं, सेवकों और धन-दौलत के साथ अपने पैतृक घर लौट आया। अपनी धर्मनिष्ठ पत्नी के तन पर फटे वस्त्र और उसके दुखों को देखकर उसके पति का हृदय द्रवित हो उठा। उसने अपनी पत्नी के सम्मान की रक्षा हेतु उसी गांव में एक अत्यंत विशाल, आलीशान सात मंजिला सर्वसुविधा संपन्न भवन का निर्माण करवाया और दोनों वहां सुखपूर्वक रहने लगे।
अपनी मनोकामना पूर्ण होने और जीवन में सुख का आगमन होने पर उस स्त्री ने शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार संतोषी माता के महाउद्यापन का पवित्र संकल्प लिया। उसने अपने उद्यापन के पावन अवसर पर अपनी जेठानी के बच्चों को आदरपूर्वक बाल-भोजन के लिए आमंत्रित किया। परंतु दुर्भावना और भयंकर ईर्ष्या के वश में आकर उसकी जेठानी ने अपने बालकों को गुप्त रूप से यह पट्टी पढ़ाकर भेजा कि वे भोजन करते समय खटाई की जिद अवश्य करें। माता के प्रभाव को न जानते हुए, उन बालकों ने भोजन के मध्य में रोते हुए इमली की तीखी खटाई की मांग की और माता की माया से प्रभावित होकर उन बच्चों ने चुपके से खट्टी वस्तु का सेवन कर लिया। इस घोर नियम-भंग के कारण माता संतोषी उस स्त्री से अत्यंत रुष्ट हो गईं। देखते ही देखते राजा के सैनिक आए और उसके निर्दोष पति को किसी झूठे आरोप में बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया।
वह पतिव्रता स्त्री तत्काल समझ गई कि निश्चय ही व्रत के उद्यापन में कोई बहुत बड़ी आसुरी भूल या खटाई का स्पर्श हुआ है। वह तुरंत भागकर माता के मंदिर पहुँची और रो-रोकर अपने आंसुओं से माता के चरणों को धोते हुए अनजाने में हुई इस महान भूल के लिए क्षमा मांगी। उसने माता के सम्मुख पुनः प्रण लिया कि वह अगले ही शुक्रवार को अत्यंत कड़ाई से और शुद्धता के साथ दोबारा महाउद्यापन संपन्न करेगी। भक्तवत्सला माता संतोषी का हृदय पिघल गया और उन्होंने अपनी दासी को क्षमादान दे दिया। राजा ने उसके पति को ससम्मान कारागार से मुक्त कर दिया। अगले शुक्रवार उसने पूरी सावधानी बरतते हुए, बिना किसी खटाई के अंश के, पवित्र ब्राह्मण कुमारों को और बालकों को हलवा, पूरी, खीर और चने का सात्विक भोजन कराया। माता संतोषी अत्यंत प्रसन्न होकर साक्षात प्रकट हुईं और उन्होंने उनके पूरे परिवार को अखंड सौभाग्य, असीम धन-धान्य, दिव्य आरोग्य और सुंदर संतान के सुख से परिपूर्ण कर दिया। जिस प्रकार करुणामयी माता ने उस दीन स्त्री के कष्टों को हरकर उस पर अपनी दिव्य कृपा की, वैसी ही कृपा इस कथा को पढ़ने, सुनने और मानने वाले संपूर्ण भक्तों पर हमेशा बनी रहे।
संतोषी माता महाउद्यापन की शास्त्रीय विधि
जब आपके द्वारा संकल्पित शुक्रवारों की संख्या (जैसे 16 शुक्रवार) पूर्ण हो जाए, तो अंतिम शुक्रवार को उद्यापन का महाअनुष्ठान किया जाता है। उद्यापन की इस विधि में तनिक भी लापरवाही नहीं होनी चाहिए, इसकी प्रामाणिक विधि का पालन करने से ही पूर्व में किए गए सारे व्रतों का पुण्य फल सिद्ध होता है:
- 8 बालकों का सात्विक भोजन: उद्यापन के पावन दिन, सुबह की सामान्य पूजा और कथा संपन्न करने के पश्चात अपने परिवार, कुल या पास-पड़ोस के 8 पवित्र बालकों (कुमारों) को आदरपूर्वक भोजन के लिए अपने घर पर आमंत्रित करें।
- भोजन की शुद्धता और निर्माण: उद्यापन के भोजन में केवल शुद्ध गाय के घी में बनी पूरियां, सात्विक मखाने की खीर, बिना नमक और बिना टमाटर की चने की रसेदार सब्जी और सूजी का हलवा होना चाहिए। ध्यान रहे कि भोजन बनाने वाले बर्तनों में पहले कभी खट्टा न पका हो, और भोजन में नमक या खटाई का एक कतरा भी नहीं होना चाहिए।
- दक्षिणा और विदाई के नियम: बालकों को तृप्त होने तक भोजन कराने के पश्चात उन्हें भूलकर भी नगद पैसे (सिक्के या नोट) दक्षिणा में न दें, क्योंकि बच्चे उन पैसों से बाहर जाकर खट्टी चीजें खरीद सकते हैं। दक्षिणा के रूप में उन्हें केवल मीठे फल (जैसे केला, सेब जो खट्टे न हों), कोई धार्मिक पुस्तक, मिठाई या वस्त्र दें और अंत में गुड़-चना देकर उनके चरण छूकर आशीर्वाद लें।
- संपूर्ण परिवार के लिए सावधानी: उद्यापन संपन्न होने के बाद भी उस पूरे दिन और रात को घर का कोई भी सदस्य खट्टी चीज़ों का सेवन नहीं करेगा। भोजन करके जाने वाले बालकों को भी प्रेमपूर्वक समझा दें कि वे उस दिन अपने घर जाकर भी कुछ खट्टा न खाएं।
संतोषी माता व्रत के अचूक एवं शास्त्रसम्मत लाभ
सनातन शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, जो भी जातक इस परम पावन व्रत को संपूर्ण विधि-विधान से करता है, उसे जीवन में चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं। अविवाहित कन्याओं को अत्यंत सुयोग्य, संस्कारी और दीर्घायु वर की प्राप्ति होती है। जिन दंपत्तियों के जीवन में संतान का सुख नहीं है, उन्हें उत्तम और संस्कारी संतान प्राप्त होती है। कोर्ट-कचहरी या लंबे समय से अटके हुए कानूनी विवादों में न्यायपूर्ण विजय मिलती है। व्यापार, नौकरी या उद्योग में मंदी दूर होती है और फंसा हुआ धन अति शीघ्र वापस आता है। सबसे बढ़कर, इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य का मन शांत, संतुलित और संतोष से भर जाता है।
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